बहुजन नायक कांशीराम

जनसंख्या की दृष्टि से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर-प्रदेश में जिस प्रकार बहुजन समाज पार्टी अपने दम पर सत्ता में आई वह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए किस चमत्कार से कम नहीं। एक चमत्कार ही था मात्र 20-22 वर्ष पूर्व स्थापित पार्टी ने अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सत्ता का सफर पूरा किया। इसके पीछे छिपे कारण को शायद ही किसी ने जानने का प्रयास किया हो। इसके पीछे थी कांशीराम जी की ‘सोच’। एक सपना जो उन्होंने देखा वह साकार हो चुका था। कांशीराम जी की सोच, उनका दृढ़ निश्चय और असफलताओं के हार न मानने के चारित्रिक गुणों के कारण ही इन्होंने ‘बहुजन-समाज’ को एकजुट करके दिखा दिया। कांशीराम जी के पास अच्छी खासी सरकारी नौकरी थी। वह चाहते तो संतुष्टि का जीवन जी सकते थे, मगर उन्हें तो आगे जाने की एक ललक थी, बहुजन समाज को एकजुट करने का सपना था। सपना कठिन अवश्य था, कांशीराम जी के आत्मविश्वास ने इस कठिन सपने को सच कर दिखाया।


 सन् 1934 को माता विशन कौर की कोख से एक होनहार बालक कांशीराम का जन्म हुआ था। कोई नहीं जानता था कि यह बालक एक दिन बहुजननायक बन जाएगा, जिसके द्वारा स्थापित पार्टी एक दिन भारतीय राजनीतिक की घुरी बनेगी और पार्टी सत्ता के ताले की ‘मास्टर चाबी’ बन जाएगी।
कांशीराम जी ने एक साधारण कृषक परिवार में जन्म लिया। उनकी शिक्षा-दीक्षा भी साधारण स्कूलों में हुई। यही वजह है कि उनके बचपन तथा विद्यार्थी जीवन की बहुत अधिक सामग्री आज उपलब्ध नहीं है। साधन बहुत सीमित थे, ‘लक्ष्य’ बड़ा। पर साधन सीमित होने के बावजूद कांशीराम जी ने हिम्मत नहीं हारी, क्योंकि उनका ‘विजन’ स्पष्ट थाµबहुजन समाज को एकजुट करना। सफल बनने के लिए आप भी अपने ‘विजन’ को स्पष्ट रखें। आपका स्पष्ट ‘विजन’ ही आपको लक्ष्य तक ले जाएगा। 
वर्ष 1958 में पंजाब के जिला रोपड़ के पब्लिक काॅलेज से बीएसी करने के बाद कांशीराम जी ने एक वर्ष के बाद ही 1957 में ‘सर्वे आॅफ इंडिया की परीक्षा पास की। इन्हें देहरादून बुलाया गया और टेªनिंग शुरू हो गई। नौकरी अच्छी खासी थी। कांशीराम जी चाहते तो इस नौकरी के साथ जीवन यापन कर सकते थे। लेकिन इनकी मंजिल तो कुछ और ही थी। इन्होंने नौकरी के लिए आवश्यक बाॅण्ड पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और टेªनिंग से पहले ही नौकरी छोड़ दी। कुछ दिनों बाद इनकी पूना में नौकरी लग गई पूना में वे ‘एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डवलपमेंट लेबोरेट्री’ (ई.आर.डी.एल.) में अनुसंधान सहायक के पद पर नियुक्त हुए। इस पद तक पहुँचने के लिए फौज के डिफेंस साइंस एवं रिसर्च डवलपमेंट आॅर्गनाईजेशन की परीक्षा भी पास करनी पड़ती थी, जिसे उन्होंने बखूबी पास किया। कांशीराम जी यहाँ भी संतुष्ट हो सकते थे, परंतु उनकी मंजिल यह नहीं थी। उनका सपना तो और आगे जाना था। उस मुकाम पर जहाँ वह दलित समाज को एकजुट एक सकें। प्रथम श्रेणी की जिस सरकारी नौकरी को पाने के लिए लोग आधी उम्र संघर्ष करने में बिता देते हैं, कांशीराम जी ने वह नौकरी 6 साल में ही छोड़ दी। उन्होंने एक निर्णय लिया जो ‘कठिन’ तो था पर सटीक था। ऐसा निर्णय जिसे शायद ही कोई ले, निर्णय कटु था। विजन स्पष्ट था देश की राजनीति की धुरी बनना, दलित समाज को एकजुट करना। कांशीराम जी में एक ‘विश्वास’ था, स्वयं पर, अपनी सफलता पर। यही ‘विश्वास’ उनकी सफलता की नींव बना। कांशीराम जैसे व्यक्तित्व सही निर्णय लेने में विश्वास नहीं रखते, वे पहले निर्णय लेते हैं, फिर स्वयं की योग्यता, प्रयासों एवं आत्म-विश्वास पर विश्वास रखते हुए इस निर्णय को सही साबित करके दिखा देते हैं जैसा कांशीराम जी ने कर दिखाया। अपने सपने को साकार करने की दिशा में कांशीराम जी ने पहला कदम 6 सितम्बर 1978 को आॅल इंडिया बैकवर्ड एवं मायनारिटीज कम्युनिटीज एम्पलाइज फैडरेशन बनाकर उठाया और दलितों, पिछड़ों तथा अल्पसंख्यक सरकारी कर्मचारियों को गोलबंद कर अपनी मुहिम शुरू कर दी। सरकारी कर्मचारियों में पेठ बनाने के कारण कांशीराम को कई जगह समर्थन तो मिला ही साथ ही रहनेखाने का इंतजाम भी होने लगा।
धीरे-धीरे कारवां आगे बढ़ने लगा, इससे प्रभावित होकर कांशीराम ने 6 दिसम्बर, 1981 को दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की स्थापना कीµ शराब विरोधी आंदोलन के तहत देश भर में साईकिल यात्राएँ की। वे भी दिन थे जब कांशीराम बरेली में अमर उजाला जैसे अखबारो में एक रिलीज छपवाने के लिए चार-चार बार दफ्तर जाया करते थे। फिर भी रिलीज नहीं छपती थीं, लेकिन इन बातों ने कांशीरामजी का हौसला पस्त नहीं किया। उन्होंने 14 अप्रैल, 1984 को डाॅ. अंबेडकर के जन्मदिन पर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। बासपा को प्रारंभिक दौर में चुनाव में कांशीरामजी को उम्मीदवार तक नहीं मिल रहे थे। कुल मिलाकर इस पार्टी को 1984 के लोकसभा चुनाव में 10.05 लाख वोट मिले, लेकिन इससे कांशीराम हताश नहीं हुए। उन्होंने स्वयं पर विश्वास था। उन्हें अपनी सफलता की पूरी आशा थी। अब वी.पी. सिंह जी ने जून 1988 में इलाहाबाद से पर्चा भरा तो कांशीराम अकेले वहाँ चुनाव लड़ने पहुँच गए। और 71583 वोट पाकर सबको चैंका जरूर दिया। 
हार हो या जीत कांशीराम नंबर 1 नेता के खिलाफ सदैव लड़तें, उन्होंने कभी भी हौंसला नहीं छोड़ा। जीत के प्रति उनकी तीव्र उत्कंठा थी। चुनाव लड़ते रहे और इसका सबसे बेहतरीन नमूना 1989 का लोकसभा चुनाव था जब उन्होंने राजीव गाँधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ा। अंत में कांशीराम जी को सफलता मिल ही गई, और वह 3 साल नवंबर 1992 में इटावा से निर्वाचित होकर लोकसभा में पहुँच गए। उनका ‘विजन’ अब और स्पष्ट होने लगा था। भारतीय राजनीति में बसपा धीरे-धीरे अपनी पहचान पाने लगी। कांशीराम जी का सपना साकार की और अग्रसर होने लगा।
बसपा का ग्राफ उ.प्र. में लगातार बढ़ता रहा और 1996 में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके बसपा ने 67 सीटें और 20 फीसदी वोट प्राप्त किए जोकि बसपा के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी जो सन् 2002 के चुनाव में बढ़कर 100 सीटों तक हो गई। इस दौर में बसपा ने सर्वर्णों को भी अपनी और मोड़ने में काफी सफलता पाई। इस सब के बावजूद बसपा का सफर लगातार जारी रहा। सन् 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांशीराम जी द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा में अपने दम पर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। यह ऐसा पहला अवसर जब उत्तर प्रदेश में जब कांग्रेस तथा भाजपा जैसी दिग्गज पार्टियों को छोड़कर किसी पार्टी ने स्पष्ट बहुमत पाकर सरकार बनाई हो। जब कांशीराम जी करोलबाग के छोटे से आफिस में बैठकर भारतीय राजनीति की धुरी बनने का ‘सपना’ देखा करते थे, उस समय शायद ही किसी ने ऐसा सोचा होगा कि एक दिन यह सपना साकार हो जाएगा। लेकिन कांशीराम के दृढ़निश्चिय ने इस सपने को साकार कर दिखाया।

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