अमेरिका का स्टील किंग: एंड्रयो कारनेगी

‘एंड्रयो कारनेगी’ नाम एक ऐसे कर्मठ योद्धा का जिसने सीमित संसाधनों के बीच कभी भी ऊंचे सपने देखने नहीं छोड़े। वह जानता था साधन सीमित है, लंबा सफर, राहें अंजान, रास्ता कठिन पर ‘आशा’ और ‘विश्वास’ जैसे साथियों ने उसका साथ कभी नहीं छोड़ा। मुश्किलों को मुस्कराकर सुलझाने का हुनर वह अच्छी तरह जानता था। उसके इसी जज्बे ने एक दिन ‘संयुक्त राज्य अमेरिका का स्टील किंग’ बना दिया।


ऐड्रयू कारनेगी का जन्म 25 नवंबर, 1831 में स्काटलैंड के शहर डुनफरमलिन ;क्नदमितउसपदमद्ध में गरीब परिवार में हुआ। इनका परिवार विस्थापित होकर अमेरिका में आ गया था। इनके पिता एक जुलाहे थे। अब आप ही अनुमान लगा सकते हैं कि इन परिस्थितियों में अमेरिका के धन कुबेरों में सम्मिलित होने का सपना देखना कारनेगी के लिए ‘मरुस्थल में खेती’ करने के समान था। कुछ कर गुजरने की जिद्द के आगे हर प्रकार की विपरीत परिस्थितियों को हार माननी पड़ती है। यदि कारनेगी बचपन या युवावस्था में अपने सपने ही पर चर्चा करता होगा तो लोग इसे मात्र ख्याली पुलाव ही समझते होंगे। एक नीचे स्तर पर बैठकर ऊपर के विषय में सोचा तो जा सकता है पर उसे पूरा करना एक चुनौती ही होता है। इस प्रकार की चुनौतियों को कारनेगी जैसा व्यक्तित्व ही स्वीकार कर सकता है। इस प्रकार की चुनौतियों के स्वीकार करने के कारण ही आज ‘कारनेगी’ न केवल अमेरिकी जनता अपितु सारे विश्व के लिए आदर्श बन चुके है।
इनके पिता विलियम कारनेगी जुलाहे का कार्य किया करते थे। भाप से चलने वाले करघे ;स्ववउद्ध के आने के पश्चात। हस्त-चालित करघे बंद हो गये जिसके कारण विलियम कारनेगी बेरोजगार हो गए। इस स्थिति में उनका परिवार आर्थिक संकट की चपेट में आ गया। परिवार दाने-दाने के लिए तरस गया। अंत में विलियम कारनेगी की पत्नी श्रीमती विलियम कारनेगी ने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने की ठान ली उन्होंने जूते बनाने की एक छोटी-सी दुकान खोल ली। इसके बावजूद विलियम कारनेगी के लिए परिवार के रोजी-रोजी का खर्चा चला पाना कठिन हो गया। इन विषम परिस्थितियों से उकता कर परिवार ने स्काॅटलेन से विस्थापन करने का कटु फैसला लिया। परिवार स्काटलैंड छोड़कर अमेरिका में आ बसा।
अमेरिका पलायन के पश्चात् भी परिवार की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। इन्हीं सब परिस्थितियों में एंड्रयू कारनेगी ने 13 वर्ष की आयु में स्वयं ही अपनी आर्थिक जिम्मेदारियाँ उठाने का फैसला किया। इतनी छोटी सी आयु मे ही इन्होंने सूत की फैक्ट्री मे कार्य करने का निर्णय लिया। जहाँ इन्हें 1.20 डालर साप्ताहिक वेतन प्राप्त होता था।
इस छोटी-सी आय में कारनेगी को अपने जीवन का सपना पूरा होता नहीं दिखाई दिया अतः एक वर्ष के पश्चात् ही इन्होंने इस कार्य को छोड़ दिया। तत्पश्चात इन्होंने टेलीग्राफ कंपनी में संदेहवाहक के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया। इनके व्यक्तित्व के दो गुण थे, श्रेष्ठतम् कार्यक्षमता प्रदान करना तथा लगन से कार्य का निष्पादन करना। अपने व्यक्तित्व गुणों के बल पर वह शीघ्र ही टेलिग्राम आॅपरेटर बन गए। इनके कैरियर का सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन बिंदु पेंसिलवानिया रेलरोड कंपनी ने कार्य करना रहा। यहाँ पर अपनी प्रतिभा के दम पर वह शीघ्र ही थामस स्काॅट नामक प्रसिद्ध रेल अधिकारी के सहायक बन गये। यहाँ इन्होंने रेल उद्योग से जुड़ी बारीकियों को सीखा। इतने पर भी कारनेगी की और ऊँचाइयों पर पहुँचने की इच्छा नहीं समाप्त हुई। उनकी मंजिल तो कुछ और ही थी। ‘सफलता की भूख’ के चलते ही कारनेगी इस पद से उन्नति करके रेल सुपरिंटेंडेंट बन गये।
रेल सुपरिंटेंडेंट के पद पर कार्यरत रहते हुए इन्होंने निवेश करना प्रारंभ किया उन्होंने तेल क्षेत्र में अच्छा खासा धन निवेश किया। यहाँ इन्हें आशा-अनुरूप लाभ भी प्राप्त हुआ जिससे कारनेगी का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ। इसके पश्चात इन्होंने 1865 में कारनेगी रेलरोड कंपनी छोड़कर अपना ध्यान पूर्ण रूप से व्यवसाय पर ही केंद्रित किया।
इसी समय कारनेगी स्टील किंग बनने की दिशा में तीव्रता से अग्रसर हुए। उन्होंने कारनेगी स्टील कंपनी की स्थापना की। शीघ्र ही कंपनी ने इस्पात ;ैजममसद्ध के क्षेत्र में नए मुकाम प्राप्त करने प्रारंभ किये। कंपनी ने अमेरिका इस्पात क्षेत्र में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। कारनेगी ने अपने इस्पात संयत्र ;ैजममस च्संदजद्ध समूचे अमेरिका में स्थापित किये। उन्होंने इस्पात के क्षेत्र में नई तकनीकी को महत्व दिया जिससे इस्पात का उत्पादन कई गुणा बढ़ गया। व्यवसाय के क्षेत्र में सर्वाधिक आवश्यकता है आप अपने उत्पादन को बढ़ाने का निरंतर प्रयास करंे। जैसा की कारनेगी ने किया।
सन् 1889 को कारनेगी की स्टील कंपनी न केवल अमेरिका वरन् समूचे विश्व की श्रेष्ठतम इस्पात बनाने वाली कंपनी बन गई। अब एक गरीब जुलाहे का का बेटा विश्व की श्रेष्ठतम इस्पात बनाने वाली कंपनी का मालिक बन चुका था। ये किसी परीलोक के राजकुमार की कहानी नहीं जिसके भोलेपन पर रीझ कर परियों ने उसे सारी दुनिया की दौलत दे दी हो। न ही ये उस लकड़हारे की कहानी है जिसकी कुल्हाड़ी नदी में गिरने पर नदी किनारे बैठकर रोने पर नदी में रहने वाली परी ने उसे सोने की कुल्हाड़ी दे दी थी। कारनेगी मुकदर का सिकंदर नहीं था और न ही तकदीर का बादशाह। वह तो अपने सपनों को अमली जामा पहनाने वाला दस्तकार था। उसने परिस्थितियों से समझौता करने के स्थान पर उनकी चुनौतियों को स्वीकार करना उपयुक्त समझा। वह अपनी सोच से दुनिया बदलने वाला बाजीगर था। कारनेगी उन लोगों के लिए आदर्श है जो अपनी गरीबी का रोना-रोकर ही जिंदगी गुजार देते हंै, मगर उसे दूर करने के लिए कुछ नहीं करते। पुस्तक में पूर्व के अध्यायों में भी बताया गया है कि नकारात्मक सोचने वाले कारनेगी की कामयाबी पर तर्क दे सकते हैं, कारनेगी करोड़ों में एक या दो ही बनते है। वे लोग यदि यह नहीं सोचे कि उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त करनी है वे भी करोड़ों में एक बनने सकते हैं।
1901 में एक और नाटकीय परिर्वन आया। कारनेगी अपना स्टील साम्राज्य यूनाईटेड सेंट स्टील कार्पोरेशन को फाइनेंसर जे.पी. मोरगन को बेच दिया। अपने व्यापार को बेचकर उसे 200 मिलियन डालर प्राप्त हुए। 65 वर्ष की आयु में कारनेगी ने अपने जीवन का समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
कारनेगी की शिक्षा के क्षेत्र में गहन रुचि थी। इसी के चलते कारनेगी ने पुस्तकालयों के निर्माण कार्यों में उपयोगी वित्तीय योगदान दिया। इन्हांेने कारनेगी इन्स्टीट्यूट आॅफ टेक्नालाॅजी (Carnegie Institute of Technology) की स्थापना की। जो अब कारनेगी-मेलन यूनिवर्सिर्टी (Carnegie Mellon Universtiy) के नाम से जाता है।
कारनेगी का व्यक्तित्व न केवल अमेरिका अपितु समूची दुनिया में एक मिसाल है। कारनेगी के जीवन से यही सीख मिलती है कि सपने देखना मत छोड़ो, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए भी हर संभव प्रयास करो। कारनेगी जैसे व्यक्तित्व ही ‘विशुद्ध रूप से विजेता’ कहलाने लायक होते है। कारनेगी ऐसा नाम है जिसके समक्ष संभवतः ‘सफलतम’ जैसा शब्द भी बौना लगता है। 

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