विश्व में आॅटोमोबाइल क्रांति का सूत्रधार: हेनरी फोर्ड

विश्व में ओटोमोईबल के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात करने का श्रेय हेनरी फोर्ड को जाता है। हेनरी फोर्ड के विषय में कहा जाता है, वे धुन के पक्के थे। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति ही उनकी सफलता का मूलमंत्र थी। वह किसी भी परिस्थिति में हार मानने को तैयार नहीं नहीं थे। उन्हें तो बस कुछ न कुछ नया करने का जूनून सवार रहता था।
हेनरी फोर्ड का जन्म 30 जुलाई, 1863 को एक एक सम्पन्न कृषक परिवार में हुआ। इनका लालन-पालन ग्रामीण परिवेश में हुआ। हालांकि परिवार सम्पन्न था पर गांव में शिक्षा की सुविधा का अभाव था। इन्होंने प्राथमिक स्तर पर जिस विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की वह स्कूल मात्र एक कमरे में चलता था।


वह बचपन से ही मैकेनिकल कार्य में रूचि लेते थे। वह कृषि कार्य को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। अपनी इसी रुचि के कारण फोर्ड समीप के शहरी डेट्रायट में आ गए। यहाँ इन्होंने एक प्रशिक्षु मैकेनिक के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया। इसके बावजूद भी वह कृषि-कार्य से जुड़े रहे। वह समय समय पर अपने गाँव जाकर कृषि-कार्यों में अपने परिवार का हाथ बटाया करते थे।
सन् 1891 में हेनरी एडोशन की ल्यूमिनेंटिंग कंपनी में इंजीनियर के पद पर नियुक्त हुए। यह घटना इनके जीवन में परिवर्तन बिंदु (Turning point) सिद्ध हुई। उसके पश्चात अपनी मेहनत और लगन से हेनरी शीघ्र ही चीफ इंजीनियर बन गए। यहाँ इनके पास प्रयोग करने के लिए काफी समय था। जिसके फलस्वरूप इन्होंने 1896 में क्वाडरिसाइकल (Quadricycle) का आविष्कार किया। जो दुनिया की सर्वप्रथम घोड़ों रहित गाड़ी थी। जो दुनिया के लिए किसी भी अजूबे से कम नहीं थी।
1899 में हेनरी डेट्रोसाइट आॅटोमाबाइल कंपनी में शामिल हो गए। इन्हें यहाँ भी मजा नहीं आया, क्योंकि उनकी मंजिल अभी बहुत दूर थी और यहाँ रहकर वह अपनी मंजिल नहीं पा सकते है। इसके लिए इन्हें नए रास्ते तलाशने थे। उन्होंने रेसिंग कार बनाने का कारखाना स्थापित किया। पूर्व कंपनी में हेनरी को अच्छा खासा वेतन मिल रहा था। फोर्ड चाहते थे कि उसमें ही संतुष्ट हो सकते थे। पर इनका सपना तो बुलंदियों को छूना था, जो यहाँ बैठकर संभव नहीं था। अपने सपने को पूरा करने के उद्देश्य से ही उन्होंने स्वयं का कारखाना स्थापित किया जो फोर्ड के लिए बहुत बड़ा जोखिम था। लेकिन सफलता के लिए ललायित व्यक्ति को जोखिम से कहाँ डर लगता है। इन्हें तो बस अपनी मंजिल ही नजर आती है। फोर्ड का कंपनी फोर्ड के नेतृत्व मे कार्य करने लगी। 1902 में कंपनी का नाम केडिले ;ब्ंकपसपंबद्ध मोटर कंपनी हो गया। 16 जून, 1904 को फोर्ड मोटर कंपनी स्थापित हुई। इस कंपनी ने प्रथम माॅडल ‘ए’ के नाम से बनाया जिसकी बिक्री डेट्राइट (Quadricycle) प्रारंभ हुई। कुछ ही महीनों पश्चात फोर्ड की कंपनी ने लाभ कमाना प्रारंभ कर दिया। अब आॅटोमोबाइल क्षेत्र में फोर्ड की महत्वाकांक्षा का बढ़ना लाजमी था। फोर्ड का सपना था आॅटोमोबाईल क्षेत्र में नई बुलंदियों को पाना।
इसी विचार को ध्यान में रखकर फोर्ड एक बड़े समूह के लिए एफोर्डेबल (Affortable) कार बनाना चाहते थे। अपनी मार्केट योजना को अंजाम देने के उद्देश्य से ही कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 58.5 प्रतिशत कर दी। फोर्ड के जीवन का सबसे बड़ा सपना था श्ज्श् माॅडल की कार बनाने का। वह यह भी चाहते थे कि इस कार को बनाने पर भारी-भरकम खर्च न करना पड़े। उन दिनों यह कार्य फोर्ड के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन-सा था। इस स्थिति में तो बस फोर्ड के साथ उसकी दृढ़ ‘इच्छाशक्ति’ थी। वह प्रत्येक परिस्थिति में इस माॅडल का निर्माण करना चाहता था। फोर्ड हार नहीं मानना चाहते थे, माॅडल का निर्माण ही फोर्ड की जीत था। ‘सफल’ और ‘असफल’ व्यक्ति में एक सबसे बड़ा अंतर, यही होता है, सफलतम व्यक्ति हर हाल में अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है इसके विपरीत असफल व्यक्ति लक्ष्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं के विषय में ही सोचता रह जाता है। या फिर उस लक्ष्य के विकल्प को तलाश करने करता है। फोर्ड सफल हुए, क्योंकि उन्हें तो किसी भी प्रकार से श्ज्श् माॅडल बनाना था। अंततोगत्वा फोर्ड ने 'T'  माॅडल बनाकर ही दम लिया। 'T' माॅडल सन् 1908 में बाजार में उतारा गया। कंपनी ने इस माॅडल की कार को 850 डाॅलर मे बेचने का फैसला किया। उस समय यह सबसे सस्ता माॅडल था। इसे सरलता के साथ चलाया जा सकता था। इन्हीं गुणों के कारण इन माॅडल ने अमेरिका बाजारों में धमाल मचा दिया। लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। फोर्ड में न केवल एक निपुण इंजीनियर के गुण थे अपितु अपनी योजनाओं को कारगर ढंग से अमली जमा पहनाने के कारण कुशल प्रबंधक के गुण भी थे। श्ज्श् माॅडल की मांग दिनों-दिन बढ़ रही थी। वह इसके उत्पादन को बढ़ाना चाहते थे। उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक था, कंपनी के कर्मचारी अपनी श्रेष्ठतम कार्यक्षमता से कार्य करें। इस हेतु फोर्ड ने उनके वेतन में वृद्धि कर दी तथा कार्य के घंटे भी घटा दिये। इन सबके चलते कर्मियों की कार्यक्षमता बढ़ी तथा कंपनी के उत्पादन में वृद्धि हुई। अधिक लोगों तक यह कार पहुँचाने के उद्देश्य से फोर्ड ने अपनी 'T' माॅडल की कार का मूल्य 850 डाॅलर से घटाकर 290 डाॅलर कर दिया। इस योजना का परिणाम यह हुआ कि उस वर्ष कंपनी ने लगभग एक मिलियन कार बेचीं। अपनी दूगामी योजना के कारण फोर्ड की कंपनी दिन दूगुनी राते-चैगुनी उन्नति करती चली गई। कंपनी ने 1927 में 'T' माॅडल का निर्माण बंद कर दिया। इस समय तक कंपनी 1.50 करोड़ कारों की बिक्री कर चुकी थी, जो विश्व की किसी भी कंपनी के लिए बड़ी उपलब्धि थी।
वर्तमान समय में फोर्ड कंपनी विश्व प्रसिद्ध कंपनी में गिनी जाती है। इसका श्रेय फोर्ड को ही जाता है। इन्होंने घोड़ रहित गाड़ी बनाने का सपना देखा था, जो उन दिनों कोरी कपोल कल्पना ही था। फोर्ड ने हिम्मत नहीं हारी। इन्होंने क्वाडिसाइकल बना कर अपने सपने को पूरा किया। उसके बाद उनका सपना था एफोर्डेबल कार बनाने का। उस समय यह भी अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य था। फोर्ड ने पुनः हारी नहीं मानी। इनकी दृढ़ इच्छाशक्ति ने ही इन्हें ओटोमोबाईल क्षेत्र में क्रांति का सूत्रधार बना दिया। आज आप कारों को जिस रूप में देखते हैं, वह फोर्ड के ‘सपने’ का ही परिणाम है। यह सत्य है कि सपने खुली आँखों से नहीं देखे जा सकते, मगर उन्हें पूरा तो खुली आँखों से किया जाता है। सपने भूलने के लिए या मानसिक संतुष्टि के लिए मत देखो, सपने सच करने के लिए देखों। फोर्ड मात्र यह सोचकर ही की श्ज्श् माॅडल की कार ऐसी होगी, वैसी होगी छोड़ देता तो शायद 'T' माॅडल की कार इस दुनिया में न आ पाती। पर फोर्ड ने ऐसा नहीं किया उन्होंने अपने सपनों को वास्तविकता के धरातल पर लगाकर ही दम लिया। ‘सफल’ बनना चाहते हो तो, ऐसा ही जज्बा पालो। फोर्ड जैसा बनने के लिए फोर्ड जैसी सोच रखना अति आवश्यक है।

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