तांगा चालक से मसाल किंग तक

समय एवं परिस्थितियाँ व्यक्तियों को न जाने क्या-क्या करने के लिए मजबूर कर देती हैं। वर्तमान समय में ‘मशाला किंग’ एमडीएच के मालिक महाशय (धर्मपाल गुलाटी) ने अपने बुरे दौर में तांगा तक चलाया, मगर परिस्थितियों से किसी कीमत पर समझौता नहीं किया। अपने ‘लक्ष्य’ के प्रति अडिग रहे। कभी हार नहीं मानी कभी समझौता नहीं किया। पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने इरादों पर डटे रहें। संघर्ष को ही अपना ध्यैय बनाकर अपनी मंजिल की और बढ़ते रहे, उस मंजिल की ओर जो एक ख्वाब जैसी थी, उसे हकीकत बनाने के लिए लंबा सफर तय करना था। उस मंजिल तक पहुँचने तक न जाने कब कदम जबाव दे जाएं, पर चलने के बुलंद हौंसले ने उन्हें कामयाबी की बुलंदियों पर पहँुचा ही दिया।


गुलाटी की जीवन कहानी भी उन सफल लोगों की तरह है जिन्होंने सफलता के लिए अनेक समस्याओं का समाना किया और सफलता को अपने पक्ष में करके की दम लिया। गुलाटी के परिवार ने भी देश विभाजन का दंश झेला। देश-विभाजन से पूर्व गोलाटी जी ने पांचवी कक्षा से ही पढ़ना छोड़ दिया अर्थात उनकी शिक्षा केवल प्राथमिक स्तर तक ही हुई थी। मात्र प्राथमिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद गुलाटी जी ने ऊपर देखना नहीं छोड़ा। विभिन्न प्रकार के काम-धंधों में हाथ डाला। सफलता हाथ नहीं लगी, पर धुन के पक्के व्यक्ति कब कहाँ हार मानने वाले होते है। गुलाटी जी भी इसी तरह के व्यक्ति हैं। देश विभाजन के पश्चात गुलाटी जी पाकिस्तान छोड़ दिल्ली चले आए। सिर पर खुला आसमानं और कंधों पर परिवार के भरण पोषण का बोझ। इन्हीं सब परिस्थितियों से समझौता करके उन्होंने अजीविका चलाने के लिए तांगा चलाया। तंागा चलाना हालांकि उनकी मंजिल नहीं थी और न ही तांगा चलाने का काम उन्हें मसाल किंग बना सकता था। जब अंगुली दबी हो तो उसे धीरे-धीरे ही निकालना चाहिए। झटके से निकालने पर उंगली कट सकती है। इस नीति को ध्यान में रखकर परिस्थितियों से समझौत करते हुए तांगा चलाना ही बेहतर समझा। अंग्रेजी में एक कहावत है, (Some thing is better than nothing) अर्थात कुछ न करने से कुछ करना ही बेहतर होता है। इन्हीं सब बातों पर अमल करते हुए उन्होंने तांगा चलाना ही बेहतर समझा। मगर यह नहीं भूले की तांगा उनको जीवन में सफलता नहीं दिला सकता।
कुछ समय बाद उन्होंने तांगे को छोड़कर अपने पुश्तैनी कार्य मसालों का उत्पादन एवं बिक्री प्रारंभ की। उन्होंने 1948 में करोल बाग में महाशय दी हट्टी नाम से मसालों की दुकान प्रारंभ की। उनका मसालों का धंधा चल निकला। वह शीघ्र ही वह देगी मिर्च वालों के नाम से प्रसिद्ध हो गए। अपने करोबार को और बुलंदियों पर पहुँचाने के लिए उन्होंने पैकेट मशाले बेचने प्रारंभ कर दिए। अब गुलाटी की मेहनत रंग लाने लगी उनका कारोबार दिन-दोगुनी रात चैगुनी उन्नति करता चला गया। वर्तमान समय में महाशय दी हड्डी (एम.डी.एच) मसालों के क्षेत्र में बड़ा ब्रांड है। 1948 में एक छोटी सी दुकान से प्रारंभ हुआ इनका करोबार लगभग 500 करोड़ रुपये का हो चुका है। देखा हिम्मत न हारने वालों की मेहनत का नजारा। 

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