नंद वंश का विनाशक: चाणक्य

‘चाणक्य’ ये नाम है ऐसे नायक ब्राह्मण का जिसने अपने बुद्धिकौशल एवं चातुर्य से नंद वंश जैसे दिग्गज साम्राज्य का समूल नाश कर दिया। नंद वंश और चाणक्य से किसी भी स्तर पर तुलना नहीं की जा सकती। उस समय नंद वंश को चुनौती देना किसी के वश की बात नहीं थी। फिर चाणक्य की तो बिसात ही क्या थी? उस समय नंद वंश की सुदृढ़ता को देखकर कोई उसके समूल नाश की कल्पना तक नहीं कर सकता था। और वह भी चाणक्य जैसा ब्राह्मण, ऐसा तो शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। लेकिन यदि आप पूरे उत्साह के साथ दृढ़ निश्चिय कर लें तो इस दुनिया में असंभव नाम की कोई चीज नहीं। ऐसा ही चाणक्य ने कर दिखाया था। अपनी साम, दाम, दंड, भेद की नीति पर अमल करते हुए चाणक्य ने नंद वंश का अंत करके ली दम लिया।
चाणक्य का समय 350 ई. पू. से 275 ई. पूर्व तक माना जाता है। चाणक्य का जन्म कहाँ हुआ इस विषय मे विद्धानों में मतभेद है। कुछ विद्वान चाणक्य का जन्मस्थल तक्षशिला को मानते हैं जबकि कुछ विद्वानों का मत दूसरा कि इनका जन्म दक्षिण में केरल की किसी क्षेत्र में हुआ है। पर उनके जन्म स्थान के विषय उत्पन्न विवाद में न उलझ कर उसकी उपलब्धियों के विषय में जानना बेहतर होगा।


चाणक्य नंद वंश का समकालीन था। कहते हैं, नंद के राजमहल में दस सिंहासन थे। उनपर नंद वंश के आठ राजकुमार तथा नवें पर उनके पिता आसीन हुआ करते थे। दसवें सिंहासन पर राज्य के सबसे बुद्धिमान एवं विद्वान ब्राह्मण को बैठाया जाता था। इस पर सबंधु नामक ब्राह्मण बैठा करता था। चाणक्य इस सिंहासन पर बैठना चाहता था। मौका पाकर चाणक्य उस सिंहासन पर बैठ गया। सभी नंद राजकुमारों और सबंधु को चाणक्य का यह कृत्य बुरा लगा। चाणक्य ने सबुंध को कहाँ कि ”मैं ही इस सिंहासन का वास्तविक उत्तराधिकारी हूँ। शास्त्रार्थ कर लं,े आप जीत गये तो मैं इस सिंहासन को छोड़ दूंगा। चाणक्य की इस धृष्टता पर सबंधु आग बबूला हो गया। उसने सुरक्षाकर्मियों को आदेश दिया कि तुरंत चाणक्य को बाल पकड़कर सिंहासन से उठाकर फेंक दो। सुरक्षार्मियों ने ऐसा ही किया। यह चाणक्य का घोर अपमान था। बाल पड़कर सिंहासन से हटाने के कारण चाणक्य की चोटी खुल गई चाणक्य ने उसी समय शपथ खाई, वह जब तक नंद वंश का समूल नाश नहीं कर देगा तब तक चोटी में गांठ नहीं बांधेगा। इस प्रतिज्ञा से राजा आग बबूला हो गया और उसने सुरक्षाकर्मियों को आदेश दिया, इसे अभी मृत्यु दंड दिया जाए। एक मंत्री के समझाने पर ऐसा नहीं किया गया।
नंद वंश की सुदृढ़ता तथा चाणक्य की निर्बलता के कारण उस समय लोगो को चाणक्य की यह प्रतिज्ञा मात्र कपोल कल्पना भर ही लगी होगी। कहते हैं न सफलता वे ही पाते हैं जो इरादों के पक्के होते हैं। चाणक्य भी अपने इरादों का पक्का था। उसका तो बस एक ही लक्ष्य था किसी भी तरह नंद वंश का समूल नाश किया जाए। मंजिल कठिन और रास्ता दुर्गम था पर चाणक्य ने हौंसलों और उम्मीदों की पगडंडी को कभी नहीं छोड़ा। उसे स्वयं पर पक्का विश्वास था। वह अपनी मंजिल पर अवश्य पहुँचेगा। एक बार चाणक्य जंगल से गुजर रहा था। उसने वहाँ एक अद्भूत दृश्य देखा। एक युवक ‘कुश’ के पेड़ को उखाड़कर उसकी जड़ में शरबत डाल रहा था। चाणक्य इस दृश्य को देखकर अचंभित हो गया, उसने उस युवक से पूछा आप कौन हैं भाई, और ऐसा क्यों कर रहे हैं? उस युवक ने कहा ‘मेरा मेरा नाम चंद्रगुप्त है, कुशा लगने से मेरे पिता की मृत्यु हो गई है। इस कारण मैं इस धरती से कुशा को शमूल नाश कर देना चाहता हूँ’। चाणक्य ने पुनः पूछा कुशा की जड़ों में शरबत डालने का क्या प्रयोजन है? उसने जबाब दिया, महोदय जिससे कि इसकी जड़ों में कीड़ें या चींटियां लग जाए और यह पुनः न पनप पाए। उस युवक के ‘दृढ़ निश्चिय’ और ‘आत्मविश्वास’ को देखकर चाणक्य दंग रह गया। उसे वह युवक मिल गया जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। उसने तुरंत ही उस को अपना साथी बना लिया। चाणक्य ने चंद्रगुप्त को साथ लेकर ऐसे लोगों का समूह बनाया जो महापद्मनंद के विरोधी थे। इसी समूह को साथ लेकर चाणक्य ने श्री महापद्मनंद को सत्ताच्युत कर चंद्रगुप्त मौर्य को सिंहासन पर बिठाया और स्वयं उस सिंहासन बैठा जिस पर बैठने के कारण उसे बाल पकड़कर हटाया गया था। अपने दृढ़निश्चय और बुद्धिमत्ता के दम पर निर्बल चाणक्य ने सदृढ़ नंद वंश को तार-तार कर दिया। एक कहावत हैµअकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा। लेकिन चाणक्य ऐसा अकेला चना था जिसने नंद वंश रूपी भाड़ को फोड़कर रख दिया। चाणक्य सदैव ही उन लोगों के लिए एक आदर्श रहेगा जो अपने दम पर कुछ करना चाहते है। चाणक्य का जीवन संघर्ष की मिसाल है। कभी भी अपमान को सहकर चुप मत बैठो। उस अपमान से अपना स्वाभिमान प्राप्त करने का प्रयास करने पर ही आप सही अर्थों में विजेता बन पाओगे।

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