अनपढ़ तथा मंदवुद्धि से महाकवि तक

किसी भी व्यक्ति को महाकवि बनने के लिए पढ़ा-लिखा तथा बुद्धिमान होना अति आवश्यक होता है। एक मंदबुद्धि तथा अनपढ़ व्यक्ति एक दिन महाकवि बन जाए तो एक अचम्भा ही कहा जाऐगा। कोई भी कल्पना नहीं कर सकता की अनपढ़ तथा मंदबुद्धि बालक भी महाकवि बन सकता है। लेकिन कालिदास ने ऐसा कर दिखाया। कालिदास के विषय में कहा जाता है, वह अपने प्रारंभिक दिनों में मंदबुद्धि तथा अनपढ़ हुआ करते थे। अपमान एवं तिस्कार की आग ने उन्हें महाकवि बना दिया। अपमान तथा तिरस्कार ऐसी मानसिक स्थिति है जहाँ व्यक्ति सोचने पर मजबूर होता है। यह सोच ही उसे प्रेरित करती है कुछ अपने आपको सिद्व करने के लिए। ऐसा ही कुछ कालिदास के साथ हुआ। उसमें कुछ करने की ललक जागी और एक दिन वह महान विद्वान बन गया।


कालिदास के जन्मस्थान को लेकर भी विद्वानांे मंे मतभेद है। अग्निमित्र तथा अशोक के शासनकाल से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि कालिदास का जन्म प्रथम शताब्दी से तीसरी शताब्दी के मध्य हुआ होगा। कालिदास को विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक माना जाता है। कालिदास की समकालीन विद्योत्तमा एक राजकुमारी होने के साथ-साथ एक विद्वान भी थी। उसने अपने समकालीन सभी श्रेष्ठ विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। स्त्री के हाथों हारना विद्वानों को नागवार गुजरा उन्होंने विद्योत्तमा से इसका प्रतिशोध लेने का निर्णय लिया। उन्होंने योजना बनाई की इसका विवाह किसी अनपढ़ और मूर्ख व्यक्ति से करवाएंगे। अपनी इस योजना पर अमल करने के उद्देश्य से वह एक जंगल से गुजर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा की एक व्यक्ति पेड़ की जिस डाली पर बैठा है उसी को काट रहा है। इस प्रकार के दृश्य को देखकर उनकी बांछे खिल गईं। फिर क्या था उन्होंने उस अनपढ़ तथा मूर्ख व्यक्ति को नीचे उतारकर विद्योत्त्मा से उसके विवाह की बात कही। शादी की बात सुनकर वह व्यक्ति प्रसन्न हो गया।
उन विद्वानों ने उस अनपढ़ और मूर्ख व्यक्ति को एक विद्वान बनाकर विद्योत्तमा के समक्ष बैठा दिया। शास्त्रार्थ से पूर्व विद्वानों ने एक शर्त रखी कि हमारे श्रेष्ठ विद्वान केवल मूक शास्त्रार्थ करते हैं, इस हेतु आप केवल इशारों से मूक शास्त्रार्थ ही करें। यदि आप शास्त्रार्थ में पराजित हो गईं तो आपको हमारे विद्वान सज्जन से विवाह करना होगा।
शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ, विद्योत्तमा ने हाथ दिखाया। मंदबुद्धि कालिदास को लगा कि विद्योत्तमा उन्हें थप्पड़ मारना चाहती है। उन्होंने तुरंत ही पलट कर घूंसा दिखा दिया। विद्योत्तमा ने जब उसका अर्थ पूछा तो विद्वानों ने तर्क दिया आपने पूछा की प्रकृति में पाँच तत्व होते हैं, इस पर हमारे विद्वान ने घूंसा दिखाकर कह दिया कि इन सभी से मिलकर तो हमारा स्थूल शरीर बना है। पुनः विद्योत्त्मा ने एक उंगली दिखाई तो कालिदास ने दो उंगलियां दिखा दीं। विद्योत्तमा ने पूछा इसका क्या अर्थ हुआ। विद्वानों ने कहा, आपने हमारे विद्वान से पूछा ईश्वर एक है, एक तो इसके उत्तर में हमारे विद्वान ने जवाब दिया कि ईश्वर एक है परंतु यह दो रूपों में मान्य है निराकार एवं साकार इस प्रकार उलूल-जूलूल उत्तरों के उपरांत कालिदास को विजेता घोषित करवा उसका ब्याह विद्योत्तमा से करवा दिया गया।
विवाह के उपरांत शीघ्र ही विद्योत्तमा को कालिदास की वास्तविकता का पता लग गया। किसी बात को लेकर विद्योत्तमा ने कालिदास को खरी-खरी सुनाते हुए उसका घोर अपमान किया। उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया और कह दिया कि विद्वान बन कर ही घर वापिस आना। कालिदास को ये बात लग गई। गोली का धाव भर जाता है पर कड़वी बोली का घाव कमी नहीं भर पाता। अपमानित और तिरस्कृत कालिदास ने उसी समय श्रेष्ठ विद्वान बनने का ‘दृढ़ निश्चिय’ कर लिया। यही ‘दृढ़ निश्चय’ उनकी सफलता का कारण बना। एक श्रेष्ठ विद्वान बनने के ‘लक्ष्य’ को कालिदास ने अपने अवचेतन मस्तिष्क में फिट कर लिया उन्होंने उस पर अमल किया। उन्होंने सच्चे मन से काली की आराधना की तथा विद्वानों की संगति की। काली के आशीर्वाद से कालिदास शीघ्र ही बुद्धिमान एवं विद्वान बन गए। विद्वान तथा बुद्धिमान बनने के पश्चात कालिदास अपने गृह वापस आए और उन्होंने कहाµकपाट्य उद्वाट्य सुंदरि अर्थात सुंदरी दरवाजा खोलो, सुंदरी विद्योत्तमा ने चकित होकर कहाµअस्ति कश्चित वाग्विशेषः अर्थात कोई विद्वान लगता है। कालिदास ने विद्योत्तमा के इस वाक्य को सुनकर ही तीन ग्रंथों की रचना की। कुमार संभवम का प्रारंभ होता हैµअस्तोतम स्थानदिशि से, मेघदूत का पहला शब्द हैµकाश्चित्माता और रघुवंश का प्रारंभ होता है वाग्विशेषः से यह कालिदास के दृढ ़निश्चय का ही परिणाम था जो उन्होंनें स्वयं को मंदबुद्धि से एक विद्वान के रूप में स्थापित किया।
‘दृढ़इच्छा’ शक्ति और समर्पण के सहारे जब एक मंदबुद्धिव्यक्ति भी विद्वान बन सकता है, तो सामान्य व्यक्ति क्यों नहीं। आवश्यकता है स्वयं को प्रेरित करने की, स्वयं को आगे बढ़ते हुए देखने वाली सोच की। दुनिया मे काम कोई भी असंभव नहीं, आवश्यकता है बस प्रयास की जैसा कि कालिदास ने कर दिखाया।

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