कैसेट किंग गुलशन कुमार

ये कहानी है उस नायक की जिसका परिवार देश विभाजन के पश्चात शरणार्थी के रूप में भारत आया। जिसके पास कुछ नहीं था न सिर छिपाने के लिए जगह, न बच्चों का पेट पालने के लिए कोई रोजगार। बस थी तो सब कुछ ठीक हो जाने की उम्मीद। इसी उम्मीद के सहारे इनके पिता ने दरियागंज में सड़क के किनारेे जूस बेचने का दुकान शुरू कर दिया। यही इस परिवार के रोजगार का प्रमुख जरिया बनी। अपने कैरियर के शुरूआत गुलशन कुमार ने इसी जूस की दुकान से की। इसके पश्चात उन्होंने रिकार्डर बचने का कार्य प्रारंभ किया। यही गुलशन कुमार के जीवन का टर्निंग पाइंट बना। साइंस और टेक्नोलाॅजी में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरूप गोल-गोल तश्तरीनुमा रिकार्डरों का स्थान-छोटी कैसेटों ने लेना शुरू किया। जहाँ एक ओर रिकार्डर लागत के कारण महंगे थे वहीं ओडियो कैसेट की लागत सस्ती पड़ती थी। रिकार्ड तथा कैसेट की लागत के अंतर का अनुमान लगाकर गुलशन कुमार ने पाया यदि भारत में भी आॅडियों कैसेट का कारोबार प्रारंभ किया जाए तो अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सिंगापुर गए। वहाँ से यह आॅडियों कैसेट रिकार्ड करने की मशीन लेकर आये। तत्पश्चात इन्होंने कैसेट कारोबार आरंभ किया। इनका काम चल निकला। तीस साल की छोटी सी ही आयु में गुलशन कुमार ने वह पा लिया जिसे पाने के लिए लोग सारी जिंदगी लगा देते है।


उन्होंने शीघ्र ही नोएडा में सुपर कैसेट की स्थापना की। कंपनी दिनो-दिन उन्नति के शिखरो पर पहुँचने लगी। गुलशन कुमार अब कैसेट किंग बन चुके थे। उन्होंने संगीत उद्योग पर एचएमवी के एकाधिकार को खत्म कर, स्वयं को नए रूप में स्थापित किया। फर्श से अर्श पर पहुँचने वालों में गुलशन कुमार एक नायाब नाम हे। सीमित संसाधनों के दम पर ही गुलशन कुमार ने संगीत की दुनिया में अपना अलग ही साम्राज्य खड़ा कर दिया। गुलशन कुमार भी उन लोगों के लिए मिसाल है जो कहते हैं कि सफलता के लिए असीमित संसाधन की आवश्यकता होती है। कुछ नकारात्मक सोच वाले यह कह सकते हैं कि गुलशन कुमार कितने लोग बनते हैं लाखों में एक। इस प्रकार के तर्क देकर वह अपनी नकारात्मक सोच को मजबूती देने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोग यदि उलजूल और निराशावादी तर्क देने के स्थान पर लाखों में एक बनने का प्रयास करें तो उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी। एक जूस वाले से कैसेट किंग बनने वाले इस नायक की कहानी से वह सबक ले सकते हंै। असंभव कुछ नहीं बस आवश्यकता है ‘सोच’ की मेहनत की, लगन की, स्वयं पर विश्वास की। पहले एक सपना तो देखो, फिर उसे पूर्ण आशा के साथ पूरा करने का प्रयास करो, आप भी गुलशन कुमार बन सकते है। इस बीच आपको आलोचना भी झेलनी पड़ेगी, समस्याएं भी आएंगी। लेकिन सफल वही होगा जो समस्याओं से पार आ जाए, जो उनके आगे घुटने न टेके। जिसने घुटने टेक दिए वह हार गया। जो लगा रहा वह जीत का नायक बनेगा। आप भले ही कैसेट किंग नहीं बनें किसी क्षेत्र में तो अवश्य ही किंग बन सकते हैं। बस किंग बनने का सपना तो पालो। 
गुलशन कुमार ने ऊँचे पर पहुँचकर भी कभी नीचे देखना नहीं छोड़ा। जिस जूस की दुकान से उन्होंने अरबों का करोबार खड़ा किया उन्होंने उस दुकान को आज तक बंद नहीं किया। वह दुकान आज भी कृष्णा जूस कार्नर के नाम से गोलचा सिनेमा के सामने वाली सड़क पर पर देखी जा सकती है। यह एक उदाहरण है, कभी भी उन दिनों को मत भूलो जिन्हें बिताकर आप ऊँचे स्थान तक पहुँचे हो। सफलता मिलने पर भी कभी नीचे देखना मत भूले। व्यक्ति अपने सफलता से महान नहीं बनता वह अपने कार्य से महान बनता है। ऊँचे पर बैठक कर नीचे देखना ही व्यक्ति की महानता है।
12 अगस्त, 1997 को मुंबई के ‘जुहू’ क्षेत्र में जीतेश्वर महादेव मंदिर के सामने कुछ भाड़े के हत्यारों ने गुलशन कुमार की हत्या कर दी। यह घटना संगीत की दुनिया के लिए एक गहरा आघात थी। एक बड़ी मशहूर कहावत है, ओक का पेड़ सैकड़ों वर्ष जीवित रहकर इतनी खुशहाली नहीं देता जितनी की लीली का पौधा एक दिन की जिंदगी में दे जाता है। कुछ ऐसा ही गुलशन कुमार ने किया। मात्र 42 वर्ष की आयु में गुलशन कुमार ने जिन बुलंदियों को छुआ उन पर पहुँचने के लिए सैंकड़ों जन्म भी लें तो थोड़े पड़ जाएँ। दुर्भाग्य कैसेट किंग गुशलन कुमार आज हमारे बीच नहीं। लेकिन वह करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणाòोत हैं जो फर्श से अर्श तक पहुँचने का सपना संजोए बैठे हैं।

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