भारतीय व्यापार जगत में मील का पत्थर: धीरू भाई अंबानी

एक पुरानी कहावत है कि ‘अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा’ लेकिन हौंसले बुलंद हो और कुछ नया करने की ललक हो तो अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है। बस आवश्यकता है, सोच की। भारतीय व्यापार जगत की सनसनी धीराचंद हीरानंदन अंबानी (धीरूभाई अंबानी) ने इस कहावत को गलत साबित करके दिखा दिया। एक अध्यापक के घर जन्म लेने वाले धीरू भाई अंबानी ने सीमित संसाधनांे से देश को ‘रिलायंस समूह’ के रूप में एक प्रतिष्ठित व्यापारिक संस्थान प्रदान किया जो आज न केवल भारत अपितु समूचित विश्व में भी अपनी पहचान बना चुका है।


सदैव लीक से हटकर सोचने वाले धीरूभाई अंबानी का जन्म 28 जनवरी, 1932 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के चोरबाड़ ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता एक अध्यापक थे। एक अध्यापक होने के कारण उनके पास सीमित संसाधन थे। इन्हीं सीमित संसाधनों के बीच बालक धीराचंद अंबानी का लालन पालन हुआ।
सीमित संसाधनों ने ही धीरू भाई को मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ने दिया। धुन के पक्के धीरू भाई की कुछ नया करने की ललक थी। इसी कारण मात्र सोलह वर्ष की आयु में अम्मान चले गये। विदेश में जीवन यापन कोई आसान कार्य नहीं था। एक तो घर की याद उस पर जीवन-यापन की जिम्मेदारी दोनों ने ही धीरू भाई को संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया। आत्मसंघर्ष की कटु करुणा के बीच धीरू भाई ने आशाओं के दामन को कभी नहीं छोड़ा और छोड़ते भी क्यों उन्हें तो अपनी मंजिल तक जाना था। जिससे वह लोगों के समक्ष एक मिसाल प्रस्तुत कर सके। उन्होंने अम्मान में एक गैस स्टेशन पर अटेंडेंट की नौकरी कर ली। सपने ऊँचे और नौकरी छोटी। एक पुरानी कहावत हैµशिखर तक पहुँचने के लिए सिफर से सफर प्रारंभ करना पड़ता है। यही सोच का धीरूभाई अंबानी ने इस नौकरी को करना स्वीकार कर लिया। अटेंडेंट की नौकरी रास न आने पर इन्होंने एक तेल कंपनी में क्लर्क की नौकरी कर ली।
ये दोनों की नौकरियां धीरू भाई अंबानी को पसंद न आई। उन्हें पता था की छोटी-छोटी नौकरियों सेें वह व्यापार की दुनिया के शहंशाह नहीं बन सकते। उन्हें मालूम था कि इस प्रकार की नौकरियाँ तो उनकी प्रतिभा एवं योग्यता को ही सीमित कर देंगी। इसी कारण उन्होंने नौकरी छौड़ने का फैसला किया। वह भारत चले आए यहाँ आकर इन्होंने मात्र 25000/- की छोटी सी रकम से अपना कारोबार प्रारंभ किया। एक व्यासायिक सम्राज्य की स्थापना के लिए तो 25000/- रु. थोड़े की कहे जा सकते है। एक गुना दो, दो गुना चार के सिद्धांत में विश्वास करने वाले धीरूभाई अबानी ने मात्र 25000/- से ही कराड़ों का व्यापार खड़ा करने का सपना संजोया। धीरू भाई ने सर्वप्रथम टैक्साइल के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमायी। उन्होंने ‘विमल’ नाम से कपड़े का ब्रांड लांच किया, जो खूब चला। इसके पश्चात धीरू भाई अंबानी ने पैट्रोकेमिकल क्षेत्र में हाथ डाला उन्होंने रिलायंस इंण्डस्ट्रीज की स्थापना की। रिलायंस में कामयाबी के नित्य नऐ झण्डे गाड़े। पैट्रोकेमिकल के पश्चात रिलाइंस ने टेलिकोम्युनिकेशन, इंफार्मेशन टेक्नालाॅजी, पावर, एनर्जी, टेक्साइल, इफ्रास्ट्रेक्चर तथा कैपिटल मार्केट मे भी अपनी बदशाहत का लोहा मनवाया। मात्र 25000/- रूपयों से शुरू हुआ धीरूभाई का सम्राज्य लगभग 12 बिलियन डालर के करीब पहुँच चुका है। जिसके लगभग 85000 कर्मचारी कार्यरत है।
रिलायंस का अर्थ है विश्वास। धीरू भाई अंबानी ने इसी विश्वास के साथ अपने करोबार को आगे बढ़ाया। विश्वास ही उनकी सफलता की कुंजी था। उनके साथ व्यापार करने वाले व्यक्तियों में, उनकी कंपनी में धन लगाने वाले निवेशकों में, तथा उनके यहाँ काम करने वाले कर्मियों में धीरू भाई के प्रति अटूट विश्वास था। धीरू भाई विश्वास का दूसरा नाम बन गए थे।
6 जुलाई 2002 को मुंबई में उनको अंतिम विदाई देने वाले लोगों का हुजूम था। वे लोग थे, जिन्होंने धीरू भाई अंबानी की कंपनी के शेयरों में पैसा लगाया और बाद में उन शेयरों को मुनाफे में बेचकर बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई, अपना मकान खरीदा, अपनी बिटिया की शादी की या अपनी किसी निजी आवश्यकता को पूरा किया। नम आंखों से उनकी श्रद्धांजलि अपने ‘विश्वास’ अर्थात धीरू भाई के प्रति थी। व्यक्ति इस जहाँ से चले जाते हैं, पर उनकी कृति या उनके द्वारा रचित कोई भी वस्तु सदैव अमर हो जाती है। आज व्यापार की दुनिया का बे ताज बादशाह हमारे बीच न हो पर उनका रिलायंस समूह आज भी करोड़ों निवेशकों के विश्वास को जगाए हुए है।
धीरू भाई अंबानी व्यापार जगत में सफलता का पर्याय बन गए है। वे लोग जो कहते हैं कि साधनविहीन होकर आप कुछ नहीं तो उन्हें धीरू भाई अंबानी से सबक लेना चाहिए। उन्हें अपना आदर्श बनाकर संघर्ष करना चाहिए, अगर इरादे हो बुलंद जो मंजिल हमारे करीब होगी इसमें कोई दो राय नहीं।

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