आत्म-चिंतन

सफलता एवं असफलता अपने कार्य के प्रति किए गए प्रयास का परिणाम होती है। कार्य के लिए प्रत्येक स्थिति में ही प्रयास ईमानदारी के साथ किया जाता है बावजूद इसके कई बार सफलता सफलता नहीं मिल पाती, इसके कारण कुछ भी रहे हो। कारण प्रत्येक व्यक्ति के अलग-अलग हो सकते हैं। कार्य की असफलता की स्थिति में कारणों का विश्लेषण आवश्यक होता है। आप विश्लेषण अवश्य करें। उन कारणों को जानने का प्रयास करें जो अपकी सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनें। कहने का तात्पर्य हे, आप अपने कार्य की सफलता एवं असफलता का समय-समय पर विश्लेषण करते रहें।


विश्लेषण के लिए सार्वधिक आवश्यक है आत्म-चिंतन। फुर्सत के समय बैठ कर चिंतन करें आप कहां सही थे, और कहाँ गलत। अपनी गलती को ईमानदारी के साथ स्वीकार करें। इस दुनिया के अधिकतर व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार नहीं करना चाहते। उन्हें अपने कार्य या अपने व्यवहार में कहीं भी कोई कमी दिखाई नहीं देती। बडे़ से बड़े अपराधी भी अपने को अपराधी मानने को तैयार नहीं होता। यह मानव व्यवहार की सबसे बड़ी कमी है। हममें से अधिकतर अपनी गलतियाँ औरों पर डालने की कोशिश करते हैं, एक झूठ छिपाने के सौ झूठ बोलते हैं। एक गलती को छिपाने की लिए सैंकड़ों प्रकार के प्रपंच करते है। बे-वजह की बहस करते हैं, लेकिन अपनी गलती स्वीकार नहीं करते।
सफलता के लिए आवश्यक है आप ईमानदारी के साथ कार्य करें कोई गलती होने पर उसे सहर्ष स्वीकार करें। गलती स्वीकारने से आपका कद छोटा नहीं हो जाएगा। ये मत सोचो आप ही गलत है। इस दुनिया में हर बड़े-बड़े व्यक्ति ने गलती की है। गलती करने का अर्थ कदापि नहीं की निरंतर गलती करते रहे। अपनी गलतियों को सुधारने का प्रयास करें। आखिर आप से गलती क्यों हुई?
आत्म चिंतन कीजिए सोचिए यदि आप गलती न करते तो आपके कार्य का परिणाम कुछ और ही होता। आत्म-चिंतन को अपनी दिनचर्या का अंग बनाओ। अपने दैनिक कार्यों के निष्पादन के पश्चात् पाँच-दस मिनट आत्म-चिंतन के लिए भी रखे। यदि आप नौकरी करते हैं तो आत्म-चिंतन कीजिए, आज आपने ऐसा क्या किया जिससे ‘बॉस’ ने आपको डांटा। कल से ऐसा नहीं करोगे। इसी प्रकार यदि व्यापारी हो तो आत्म-चिंतन करो कि कोई विशेष डील क्यों आपके हाथ से निकल गई। इसी प्रकार यदि छात्र को उसके अभिवावक डांटते हैं तो उसे भी अपनी गलती को सहर्ष स्वीकार करते हुए निकट भविष्य में इस प्रकार की गलती न करने का प्रयास करना चाहिए।
आत्म चिंतन ऐसी स्थिति है जहाँ आपको ‘अहसास’ करने का अवसर प्राप्त होता है। जिस दिन आप में अपनी गलती का ‘अहसास’ करने की प्रवृत्ति आ गई, उस दिन आपके जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन आ जाएगा। हमसे अधिकतर व्यक्ति अपने ‘लक्ष्य’ से भटक जाते हैं। इसके पीछे सीधा-सा कारण होता हैµन तो वे अपनी गलती पर आत्म चिंतन करते है और न ही उन्हें स्वयं के गलत होने का ‘अहसास’ होता है।
आप अपने ‘लक्ष्य’ से क्यों भटके, इसके लिए आत्म चिंतन करो। आप देखेंगे की गलती आपकी ही थी। यदि आपने गलती की है तो आप इस गलती का ‘अहसास’ करो। गलती का अहसास होने पर आप पुन्य इस प्रकार की गलती न करने के लिए तैयार हो पाओगे।
निरंतर गलतियों के कारण वह अपने ‘लक्ष्य’ से भटकते रहते हैं, जिससे के सफल नहीं हो पाते। अपने कार्यों एवं गतिविधियों पर निरंतर आत्म चिंतन करते रहने पर आप उन गलतियों से सबक ले सकते हैं, उन्हें दूर कर सकते है। इसी प्रकार आत्मचिंतन से आप अपनी योजनाओं पर भी कारगर ढंग से अमल कर सकते हैं। योजनाओं के निष्पादन में आने वाली समस्याओं का भी बेहतर ढंग से निवारण कर सकते हैं। समस्याओं का बेहतर ढंग से निवारण करने के आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।
आत्मचिंतन एक ऐसी स्थिति है जहाँ आप अपने ‘लक्ष्य’, विचारों, योजनाओं को अपने अवचेतन मस्तिष्क तक पहुँचा सकते हैं। विचारों से आत्म-द्वंद्व करके आप एक निर्णय पर पहुँच सकते हैं कि आपको किस तरफ जाना है, आपको कौन सा रास्ता चुनना है। आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किस हद तक तैयार हो। अपने चेतन-मस्तिष्क से संवाद करने के यह सबसे कारगर विधि है। यह ऐसी विधि है जहाँ आप स्वयं को पहचान पाते हैं।
एकांत में फुर्सत के साथ बैठकर अपने ‘लक्ष्य’ की सफलता के प्रति स्वयं में विश्वास जागाओ। स्वयं को विश्वास दिलाओ आप कमजोर नहीं हो। आपमें क्षमता है, आप कर सकते हैं, बस आपको प्रयास करने की आवश्यकता है। अपनी योजनाओं पर अमल करने की आवश्यकता है। परिश्रम करने की आवश्यकता है। अपने दृढ़-निश्चय बनाओ। सोचों की अगर आप सफल हुए तो क्या होगा। आप सोचों आपने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया तो आपको किस प्रकार के लाभ प्राप्त होंगे। आपका क्या महत्त्व होगा। इससे आप स्वयं लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रेरित होंगे। आप में लक्ष्य के प्रति संपर्ण पैदा होगा।
आत्म चिंतन करते हुए कभी भी स्वयं को हतोत्साहित मत करो। हतोत्साहित करने से आपका आत्म-विश्वास कमजोर होगा। आपके अवचेतन मस्तिष्क में नकरात्मक भावों का प्रवेश होगा, जिससे आपका शरीर भी नकारात्मक रूप से प्रयास करेगा। आप अपनी संपूर्ण क्षमता एवं कौशल से लक्ष्य की दिशा में नहीं बढ़ पाएंगे, आपमें लक्ष्य प्राप्त की दृढ़ इच्छाशक्ति समाप्त हो जाएगी। दृढ़ इच्छाशक्ति के समाप्त होने के कारण आपका निश्चय डगमगा जाएगा। आप अपने लक्ष्य से भटक जाओगे। यह सफल बनने के लिए उपयुक्त स्थिति नहीं है।
स्वयं से वार्तालाप करों कि एक बार असफल होने से, दुनिया खत्म नहीं हो गई, पुनः प्रयास, करां सफलता प्राप्त होने तक प्रयास करो। जो बीत गया उसे भूल जाओ, आगे के लिए प्रयास करो। स्वयं को प्रेरित करने के लिए हरिवंशराय बच्चन की निम्न पंक्तियों को दोहराओµ
जीवन में एक सितारा था
माना वो बेहद प्यारा था
वह डूब गया सो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहां मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई।

जीवन में वह था एक कुसुम
थे जिस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई।

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं, कब उठते हैं,
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
तो बीत गई सो बात गई।

मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा की करते हैं
वह कच्चा पीने वाला हैं
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता कब चिल्लाता हैं
जो बीत गई सो बात गई
जो बीत गया उसे भुलाते हुए, आगे की सोचो। हमारे आस-पास ऐसे बहुत से उदाहरण है। जैसे तारे के टूटने पर अंबर कभी नहीं, पछताता, इसी प्रकार से वल्लरियों के टूटने पर मधुवन कभी शोर नहीं मचाता। इसी प्रकार मदिरालय में दिन भर प्याले टूटते रहते हैं। इससे मदिरालय की रौनक तो कम नहीं हो जाती। इसी प्रकार जीवन में असफलता मिले तो क्या हुआ इसका अर्थ कदापि नहीं कि आप के द्वारा जीने का ढंग बदल दिया जाए। जीवन में से उमंगे ही समाप्त कर दी जाएं। सफलता और असफलता दोनों ही जीवन का अंग है। असफलता मिलने पर पुनः, सफलता के लिए प्रयास करो। इससे निराश मत हो, आशाएँ मत छोड़ो, जीवन को पूरे जोश के साथ जियो।
मुसीबतों तथा विपरित परिस्थितियों से कभी मत घबराओ। विपरीत परिस्थितियों को समाना किसने नहीं किया, निराला ने अपनी पत्नी को खोया, अपनी इकलौती बिटिया को जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करते थे, को भी खो दिया लेकिन निराला ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने दर्द को ही अपनी सफलता का आधार बनाया परिस्थितियों को ही अपना हथियार बनाया। उन्हें अपने दुःख को दर्द को अपने साहित्य का अंग बनाया। एक कवि के रूप में आज निराला की सफलता से कौन परिचित नहीं है।
इसी प्रकार महादेवी वर्मा को मात्र चौदह वर्ष की उम्र में पति ने त्याग दिया था। उन्होंने पति के पल्लू से बंधने की अपेक्षा अपना रास्ता स्वयं ही चुनने का फैसला किया। बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी। आज हिंदी साहित्य में महादेवी एक जाना माना नाम है। वे जिंदगी मे दुःख से कभी हताश नहीं हुईं। उन्होंने और उत्साह के साथ संघर्ष किया जिसने उन्हें सफलता दिलाई।
हिंदी साहित्य के महान कथाकार और उपन्यासकार प्रेमचंद ने क्या अपने कम मुसीबतें झेली। पर क्या कभी उन्होंने अपना हौंसला खोया? नहीं कभी नहीं। वे दिनभर जीविका अर्जित करने में लगे रहते तथा रात को ढिबिया के आगे पेज लेकर बैठ जाते थे और लिखते रहते। उन्होंने कभी अपनी किस्मत को नहीं कोसा। वे जहाँ रहे, उन्होंने वहीं रहकर संघर्ष किया। इसी का परिणाम है आज प्रेमचंद एक कालजयी रचनाकार बन चुके हैं। प्रेमचंद के बराबर सफलता अर्जित करना आज प्रत्येक साहित्यकार के लिए एक सपना ही होता है।
इसी प्रकार देश के द्वितीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्रीजी के पास से नदी पार जाने के लिए पैसे नहीं थे, इस स्थिति में उन्होंने नदी तैरकर पार की थी। वह मुसीबतों से घबराये नहीं। यही था उनकी सफलता का राज। एक प्रधानमंत्री के रूप में जो सफलता उन्होंने अर्जित की वह आज भी देश के समक्ष एक मिसाल है। उन्होंने 18 महीनों के छोटे से कार्यकाल में वह कार दिखाया जो कोई 18 वर्षों में भी नहीं कर सकता।
चोट सहकर ही पत्थर मूर्ति का रूप लेता है। चोट सहने के कारण ही पैरों से रौंदा जाने वाला पत्थर भी एक दिन पूज्य हो जाता है। इसलिए कभी भी असफलताओं, मुसीबतों तथा विपरीत परिस्थियों से मत घबराओं उनका सामना करना सीखो। कुंदन बनने के लिए तो आग में तपना ही होगा।
व्यक्ति स्वयं अपना मुकद्दर बनाता है, स्वयं ही बिगाड़ता है। आप सोचों अपने साथ क्या करना चाहते हो, अपने मुकद्दर को बनाना चाहते हो, या बिगाड़ना चाहते हो यह आपके ऊपर निर्भर है। अपने ‘लक्ष्य’ को पाने का भगीरथ प्रयास करोगे तो आप अपने मुकद्दर को बना सकते है। 

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