सफलता क्या है? (What is Success)

सफल कैसे बना जाए? यह एक जटिल प्रश्न है। सफलता कोई चिड़िया नहीं जिसे जाल मंे फँसा कर पिंजरे में बंद कर लिया जाए या फिर सफलता पेड़ पर नहीं लगती जिसे तोड़कर खा लिया जाए। सफलता नाम है संघर्ष का, योजनाओं को अमल में लाने का, प्रयासों, आशाओं का, धैर्य का।
कुछ लोगों के लिए सफलता मात्र धन कमाना है, मात्र धन कमाने को भी सफलता नहीं माना जा सकता। धन तो सफलता का पुरस्कार मात्र हैै। समाज में अक्सर ऐसे लोग भी देखे जा सकते हैं, जो धन-धान्य से सपन्न होने के बावजूद मानसिक रूप से संतुष्ट नहीं है। धन-दौलत होने पर भी आत्मिक रूप से संतुिष्ट नहीं तो ऐसी धन-दौलत किस काम की। सफल होने के लिए धन के साथ आत्मिक तृप्ति भी अतिआवश्यक होती है। इसे ही सफलता का नाम दिया जा सकता हैै।



सफलता के लिए प्रत्येक व्यक्ति लालायित रहता है, और हो भी क्यों न सफलता जीवन का लक्ष्य जो होती है । प्रत्येक व्यक्ति के लिए सफलता के भिन्न-भिन्न रूप हो सकते हैं। कोई सफल नेता बनना चाहता है, तो कोई सफल अभिनेता, सरकारी नौकरी पाना चाहता है (Government Job) कोई आई.ए.एस अधिकारी (IAS Officer) बनना चाहता है, कोई बैंक का एग्जाम क्लियर (IPBS Exam) करना चाहता है  तो कोई किसी मल्टीनेशनल कंपनी का प्रबंधक। कोई सफल खिलाड़ी बनाना चाहता है तो कोई सफल गायक। कोई एसईओ (SEO) में महारत हासिल करना चाहता है कहने का तात्पर्य है, हर कोई सफलता प्राप्त करना चाहता है। असफलता मिलने पर हम उसे भाग्य के मत्थे मढ़ देते हैं और कहते हैं ‘मेरे भाग्य में ऐसा ही लिखा था। ऐसी ही सोच उसे निराशा और हताशा के गहरे कुएँ मे धकेल देती है। यहाँ भाग्य की आलोचना करने का मकसद नहीं है। होता होगा भाग्य भी परंतु इसका यह अर्थ नहीं कदापि नहीं की सारी जिंदगी भाग्य को ही कोसते हुए अपने कर्मों को न देखें। भाग्य हमारे हाथ मंें नहीं तो किया हुआ सफलता को दृष्टि में रखकर कर्म करना तो हमारे हाथ में। स्वयं को ही दोष क्यों न दें। कम ही लोग ऐसे होते हैं जो असफलता के लिए स्वयं के कर्मों को कोसते है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है
मनुष्य को तो बस कर्म ही करते रहना चाहिए फल देने का अधिकार तो उस परमात्मा पर छोड़ देना चाहिए।
इसी प्रकार कर्म पर बल देते हुए तुलसी दास जी कहते हैं
सकल पदारथ हैं जग माही।
कर्महीन नर पावत नाहीं ड्ड
इस चैपाई के माध्यम से तुलसीदासजी यही कहना चाहते हैं कि संसार में सब कुछ है जो इच्छा करे उसे पा सकते है। इसके लिए तो बस प्रयास करना होगा। यदि आप प्रयास अर्थात कर्म नहीं करना चाहते तो फिर आपको कुछ नहीं मिलेगा। इसलिए सफलता प्राप्त के लिए कर्मों को प्राथमिकता देना प्रारंभ करें।
भाग्य की लाठी को छोड़कर जीवन केे पथ पर कर्म की स्फूर्ति और ऊर्जा से दौड़ लगाओ फिर देखो सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी ही। आज से ही नहीं अभी से भाग्यवादिता की जड़ मानसिकता को तोड़कर कर्मशीलता की हरियाली भूमि पर विचरना प्रारंभ करो, देखो सफलता आपके कदम चूमती है या नहीं।
कोई भी किसी खेल में हारना नहीं चाहता, सभी विजेता बनाना चाहते हैं। विजेता बनने के लिए सर्वप्रथम विजेता बनने की सोच लानी पड़ेगी। आप ‘सफल’ सोचने पर ही सफल बन सकते हैं। सफलता प्राप्ति का प्रारंभिक बिंदु सोच ही है। आपकी सोच ही आपका भाग्य बदल सकती है। इसलिए स्वय कों बदलना है, तो सर्वप्रथम अपनी सोच को बदलो। सदैव आगे बढ़ने की सोचो। नकारात्मक विचारो को त्यागो। समझौता करने के स्थान पर संघर्ष करना सीखो। कार्य प्रारंभ करने से पूर्व किंतु, परंतु, ऐसा, वैसा जैसे शब्दों के प्रयोग से कार्य की सफलता संदिग्ध हो जाती है। बहुत से लोग योजना तो बना लेते हैं पर उस पर अमल नहीं करते है। अमल करने का समय आने पर वे किंतु, परंतु, जैसे शब्दों का प्रयोग करना प्रारंभ कर देते हैं और एक ऐसी योजना जो उन्हें सफलता के पथ पर ले जा सकती थी, धरी की धरी रह जाती है।
‘जो सोचो और उसे पूरा करके दिखाओ ’ इसे हम सफलता का मूलमंत्र मान सकते हैं। सोचने वाले सोचते ही रह जाते है और करने वाले करके आगे बढ़ जाते हैं। यही है सफल और असफल व्यक्तियों के बीच का अंतर। जिसने सही समय पर सही निर्णय ले लिया वह आगे बढ़ गया, जो सोचता रह गया, निर्णय अनिर्णय के बीच लटका रह गया, वह पीछे रह गया। इस तथ्य को कहानी से समझा जा सकता है
एक गाँव में अकाल पड़ गया। लोग भूखो मरने लगे। गाँव मे अन्न की किल्लत पड़ गई। एक व्यक्ति के पास भाग्यवश कुछ आटा बचा हुआ था। उस आटे की पोटली सामने रखकर वह सोचने लगा। इस आटे को बेचकर मैं जो धन कमाऊँगा उससे एक बकरी लेकर आऊँगा। बकरी के बच्चे होंगे जब वह बड़े हो जाएँगे उन्हें बेचकर एक गाय लाऊँगा। गाय का दूध बेचकर मैं अपने व्यापार को बढ़ाऊँगा। व्यापार बढ़ने पर मैं शादी कर लूँगा। शादी होगी तो मेरे बच्चे होंगे। यदि कोई बच्चा मुझे परेशान करेगा तो मैं गुस्से से उसकी पिटाई कर दूंगा। सोचते-सोचते वह विचारों में इतना खो गया की उसने बच्चे की पिटाई के गुस्से मे उस आटे पर ही लाद दे मारी, आटा जमीन पर गिर गया। उसके सपने पलक झपकतेे ही चकनाचूर हो गए।
इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि कभी भी ख्याली पुलाव न बनाओ। पहले जो सोचो उसे पूरा करो। तत्पश्चात आगे की रणनीति बनाओ। यह नहीं कि उपरोक्त कहानी के पात्र की तरह सारे सपने पल भर में ही देख लो। ऐसा करने का परिणाम कहानी के पात्र की तरह ही होगा। सपने और सफलता के बीच बहुत गहरा रिश्ता है, सपने ही सफलता की ओर ले जाते हैं, तभी जब आप उन्हें पूरा करने के लिए दृढ़संकल्प लें। अन्यथा सपने ख्याली पुलाव ही बनकर रह जाते हैं।
क्या कभी आपने सोचा कि पश्चिमी देशों ने अधिक सफलता क्यों अर्जित की? इसका सीधा-सा उत्तर है, उन लोगों ने लीक से हटकर सोचा। नए-नए द्वीपों एवं देशों के खोज के विषय में सबसे पहले सोचा, उन्होंने औद्योगिक क्रांति के विषय में सबसे पहले सोचा, उन्होंने आसमान में उड़ने के विषय में सबसे पहले सोचा न केवल सोचा बल्कि उसके लिए प्रयास भी किया तो आज उसका ही परिणाम है कि वह दुनिया में सफलतम बने हुए हैं। आज लगभग सारी दुनिया पश्चिमी देशों द्वारा ईजाद किए गए ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीक का प्रयोग कर रही है। पश्चिम की ‘सोच’ ही पूर्व के ‘पूर्वाग्रहों’ पर भारी पड़ी और वे पूर्वी देशों से कहीं आगे पहुँच गए हैं। पूर्वाग्रहों को त्याग कर नवीन सोच को विकसित करके ही सफलता प्राप्त की जा सकती है।

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