कभी हार न मानने वाला ‘कर्मवीर योद्धा’: लालबहादुर शास्त्री

एक बालक मेला देखने के लिए अपने कुछ मित्रों के साथ गया। मेले से वापिस आते समय उसके पास नदी पान करने के लिए नाव उतारी देने के पैसे नहीं थे। उसने इस स्थिति में अपने मित्रों से पैसे उधार लेना अपने स्वाभिमान के विरुद्ध समझा। इस स्थिति में उस बालक ने नदी नाव द्वारा पार करने के स्थान पर तैर कर ही पार करने का निर्णय लिया। वह बालक कोई और नहीं स्वतंत्र भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री थे। परिस्थितियों से हार न मानकर उनसे समझौता न करने जैसे चारित्रिक गुण ही उन्हें अन्य व्यक्तियों से अलग करते हैं। लालबहादुर शास्त्री और लिंकन दोनों को ही अपने जीवन के प्रारंभिक काल में विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।


जहाँ लिंकन के पास पुस्तक खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, वहीं लालबहादुर शास्त्रीजी के पास नदी नाव उतारी देने के पैसे नहीं थे। परिस्थितियाँ विपरीत थीं, वाबजूद इसके दोनों ने ही अपने स्वाभिमान को डिगने नहीं दिया। एक ने पुस्तक अपने मित्र से मांगीं अवश्य परंतु पुस्तक के क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में उसने अपने मित्र के समक्ष क्षमा याचना करने के स्थान पर उसके खेत पर काम करके पुस्तक का मूल्य चुकता किया। इसी प्रकार दूसरे ने मित्रों से पैसे उधार मांगने के स्थान पर स्वयं नदी तैर का पार करने का निर्णय लिया। दोनों ने अपने देश मे श्रेष्ठ पद को प्राप्त किया। विजेता या सफल व्यक्तियों की कोई निश्चित परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकती है, विजेता या सफल वही होता है, जो कुछ अलग हटकर सोचता है, जो किसी भी वह कीमत पर परिस्थितियों से समझौता न करे। जो अपने निर्णय पर अटल रहे। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समर्पित रहे।
शास्त्री जी ने अपने 18 मास के छोटे से शासनकाल में वह कर दिखाया जो शायद कोई प्रधान मंत्री 18 वर्षों मे न कर पाए। अपने बुलंद हौसलें के दम पर ही एक साधारण से कदकाठी के व्यक्ति ने सन् 1965 के युद्ध मे पाकिस्तान की ईंट बजा दी। 
शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय नामक स्थान पर हुआ। इनके पिता का नाम शारदा प्रसाद तथा माता का नाम दुलारी देवी था। इनके पिता एक अध्यापक थे। अंग्रेजी शासन में अध्यापक को इतना वेतन नहीं मिलता था, जिससे वह अपने घर का गुजारा ठीक प्रकार से कर सके। इसी कारण से इनके पिता ने अध्यापक की नौकरी छोड़ कर राजस्व विभाग में क्लर्क की नौकरी कर ली। एक साधारण परिवार में जन्म लेने के कारण शास्त्री जी का लाल-पालन भी साधारण ढंग से हुआ। अभी शास्त्री जी की आयु मात्र पाँच वर्ष की थी, इनके पिता श्री शारदा प्रसाद जी का निधन हो गया। इनकी माँ दुलारी देवी पर तो मानो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट गया हो। उनके लिए अपनी दो पुत्रियों एवं पुत्र का लालन-पालन एक बड़ी समस्या बन गया। इससे आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि शास्त्री जी बचपन किन विषम परिस्थितियों से होकर गुजरा। जैसे पूर्व ही इस पुस्तक में वर्णन किया गया है, आग में तपकर ही सोना कुंदन बनता है। शास्त्री ने इन परिस्थितियों मे भी अपने हौंसलों को बुलंद ही रखा। परिस्थितियों से समझौता करने के स्थान पर ‘संघर्ष’ करना ही श्रेयस्कर समझा।
शास्त्री जी का लालन पालन इनके नाना-नानी के यहाँ हुआ। इन्होंने हाईस्कूल ‘हरिशचंद हाईस्कूल’, बनारस से पूरा किया। उस समय गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन जोरों पर था। इसका प्रभाव शास्त्री पर पड़ना स्वाभाविक ही था, फिर जो व्यक्ति अपने स्वाभिमान से समझौता न कर सकता हो, वह देश के स्वाभिमान से कैसे समझौता कर सकता था। मात्र 17 वर्ष की अल्पअवस्था में ही उन्होंने सन् 1921 के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इसी कारण इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। परंतु नाबालिग होने के कारण छोड़ दिया गया। यह शास्त्री जी की देश को स्वाधीनता दिलाने की दृढ इच्छाशक्ति थी ही जिसने कारण मात्र 17 वर्ष की आयु में ही राष्ट्रीय आंदोलन में कूदने के लिए उन्हें विवश कर दिया। इसके पश्चात इन्होंने सन् 1920 मंे काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने ‘शास्त्री’ को ही अपना उपनाम ;ैनतदंउमद्ध बनाना पसंद किया।
शास्त्री जी एक साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए। इसके पीछे छिपे कारण को जानने के लिए, उनके जीवन की विभिन्न घटनाओं का अध्ययन किया जा सकता है। एक घटना का वर्णन तो इस अध्याय के पूर्व मे किया जा चुका है। इसी तरह उनके जीवन की कुछ अन्य घटनाएँ भी है जिनका अध्ययन करके इनके व्यक्तित्व गुणों का खाका खींचा जा सकता है।
जब शास्त्री जी नैनी जेल में थे। उनकी पुत्री सख्त बीमार हुई। जेल के नियमों के अनुसार वह भी दस-पंद्रह दिन की ‘पैरोल’ पर जा सकते थे। किंतु प्रत्येक कष्ैदी को स्वहस्ताक्षरित रूप में लिखकर देना पड़ता था कि वह किसी भी राजनैतिक कार्यक्रम में भाग नहीं लेगा। इन्हें भी ऐसा करने को कहा गया । यह उनके आत्मसम्मान पर चोट थी। इन परिस्थितियों में इन्होंने न जाने का फैसला किया।
जेलर को इनकी सत्यवादिता तथा ईमानदारी पर पूरा भरोसा था। अतः बिना किसी शर्त के पंद्रह दिन की पैरोल की अनुमति दे दी गई।
इनके घर पहुँचते ही बिटिया ने दम तोड़ दिया। शास्त्री जी अपने को न रोक पाए और बिफर कर रोने लगे। अंत्येष्टि क्रिया समाप्त होते ही शास्त्री जी वापस जाने लगे। लोगों ने समझाया अभी तो पंद्रह दिन शेष है फिर जल्दी किस बात की। इन्होंने किसी की न मानी और अपने दृढ़ निश्चय पर टिके रहे। शास्त्री जी की समय से पूर्व वापसी देखकर जेलर के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने इस वावत शास्त्री जी से पूछा। शास्त्री जी ने लड़की के निधन की बात जेलर को बता दी। जेलर जानना चाहता था कि अभी तो शास्त्री जी के पास समय था, वह क्यों नहीं घर पर रुके। इस पर शास्त्री जी का कहना था जिस काम के लिए पैरोल ली थी, पूरा होे गया फिर क्या करता रुक कर। इस प्रकार अपनी बात के पक्के थे शास्त्रीजी, हालांकि जेलर ने उन्हें 15 दिन का पैरोल दिया था, पर उन्होंने शेष दिनों का कोई उपयोग नहीं किया। 
बेटी को गुजरे एक वर्ष ही हुआ था, इसी बीच पुत्र के बीमार होने की सूचना मिली। टायइफषइड-ग्रस्त होने के कारण बच्चे का बुख़ार 104 डिग्री हो गया था। पैरोल एक सप्ताह की ही मिली थी जो समाप्त होने वाली थी। ज्वर की उग्रता के कारणे बच्चे के होंठ भी सूज गये थे। वह पिता को जाने से रोकना चाहता था।
 लोगों ने अवधि बढ़ाने का आग्रह किया, किंतु स्वाभिमान ने एक पर पुनः चेतावनी दी। भावनाओं ने व्यक्तित्व पर हावी होने का प्रयास किया। परिस्थितियों ने समझौता करने का अवसर दिया। पर विजेता कहाँ रुकने वाले होते हैं, उन्हें तो हर हाल में विजयश्री को अंगीकृत करना होता है। घर में पैसा नहीं, पुत्र बीमार उस पर जेल वापिसी का दबाव। आप अनुमान लगा सकते है, शास्त्री जी के धैर्य का जिन्हे इस कठिन परीक्षा को भी सरलता से पास कर लिया।
जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे, उस समय अगस्त, 1956 में महबूबनगर रेल दुर्घटना में 112 व्यक्तियों की मौत हो गई। शास्त्री जी ने तुरंत त्यागपत्र दिया परंतु नेहरूजी ने अस्वीकृत कर दिया। नेहरू जी का मानना था, किसी की गलती पर कोई अन्य त्यागपत्र नहीं दे सकता। इस पर शास्त्रीजी ने रेल मंत्रालय को निकट भविष्य में इस प्रकार की दुर्घटना न हो इसके आदेश दिए। दुर्भाग्यवश, कुछ ही दिनों बाद अरियालूर नामक स्थान पर इससे भी भयंकर रेल-दुर्घटना हो गई, जिसमें 144 आदमी मारे गये। उन्होंने एक रेल मंत्री के रूप में अपनी खामियों को स्वीकार करते हुए तुरंत ही त्याग पत्र दे दिया। यह भारतीय इतिहास में ऐसा पहला अवसर था जहाँ इतनी गंभीरता के साथ किसी व्यक्ति ने अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार किया। ऐसा सिर्फ और सिर्फ शास्त्री जी जैसा व्यक्ति ही कर सकता था। यही इनकी सफलता का राज था, सदैव अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार करो। आप किसी समूह या विभाग में उच्च पद पर हैं, तो उस विभाग की सफलता एवं असफलता के लिए आप ही उत्तरदायी होंगे। जब सफलता का श्रेय आप ले सकते है, तो असफलता का ठिकरा किसी ओर के सिर क्यों फोड़ा जाए। इसके लिए आप किसी और को उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते। अपने उत्तरदायित्व से कभी भी मुँह मत मोड़ो। सफलता आपकी होकर रहेगी। भूल तो ड्राइवरों या कांटे वालों की, क्षति उठाई मंत्री जी ने। ऐसा उदाहरण न केवल भारत अपितु पूरे विश्व इतिहास मिलना दुर्लभ है। 
सीमित संसाधनों और विषम परिस्थितियों से गुजरने के बावजूद भी शास्त्री जी ने देश के प्रधानमंत्री बने। इसके पीछे छिपे प्रमुख कारण थे, उनके कुछ चारित्रिक गुण जैसेµस्वाभिमान, ईमानदारी, सरल व सादा जीवन, उत्तरदायित्व, परिस्थितियों से समझौता न करने की आदत तथा धैर्यशीलता इत्यादि। इनके जीवन की कुछ घटनाओं के अध्ययन पर ही आप इनके चारित्रिक गुणों का अनुमान लगा सकते है। यदि आप भी जीवन में सफल बनना चाहते हैं। तो आप को भी शास्त्रीजी के चारित्रिक गुणों को अपने जीवन में अंगीकृत करना होगा।

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