पोलियो से ओलम्पिक गोल्ड मेडल तक

आप कभी कल्पना कर सकते है कि बचपन मे पोलियो ग्रस्त कोई बालक या बालिका कभी ओलंपिक गोल्ड मेडल जीत सकता या सकती है। पर दृढ़निश्चय एवं स्वयं पर विश्वास जैसे शब्दों पर विश्वास किया जाय तो ऐसा संभव है। बस आपमें कुछ पाने की दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए। ‘विल्मा रूडोल्फ’ नामक बालिका एक ऐसा ही उदाहरण है जिसने पोलियो जैसी घातक बीमारी को भी धाता बताकर अपने को एक ‘धावक’ के रूप में स्थापित किया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति ने पोलियो से हार नहीं मानी। उन्हें स्वयं पर विश्वास था ‘वह कर सकती हैं’ और इस विश्वास के दम पर अंत में वह सफल धाविका बन सकीं। विपरीत परिस्थितियाँ भी इन्हें मंजिल तक पहुँचने से न रोक सकीं। जीवन-पथ के उबड-खाबड़ रास्ते उस पर पोलियों जैसे घातक रोग रूपी वियाबान भी उनके साहस को मिटा न सका। उनके उत्साह एवं विश्वास के आगे उसे भी नतमस्तक होना पड़ा अर्थात हारना पड़ा।


बिल्मा रुडोल्फ का जन्म 23 जून 1940 को टनेसी (Tennessee) शहर के बेथलेप नामक स्थान पर एड (Ed) तथा ब्लंच (Blanche) नामक दंपत्ति के घर हुआ। जन्म के समय उनका वजन मात्र 4.5 पौंड था। वह पोलियो जैसे घातक रोग से ग्रसित हो गईं। पोलियो के कारण उनका बायाँ पैर मुड़ चुका था। वह अपंग हो गई थी। बचपन में उन्हें दो बार डबल नमोनिया भी हो गया था। इन्हें खतरनाक ज्वर स्कारलेट फीवर (Scarlet fever) भी हो गया था। इन सब जानलेवा बीमारियों बावजूद भी विल्मा रूडोल्फ ने जीने की अपनी इच्छा को नहीं नहीं छोड़ा। मात्र 4.5 पौंड का वजन उस पर पोलियो का आघात भला ऐसी स्थिति में कौन जिंदा रह सकता है। लेकिन विल्मा के जीवट के समक्ष व्याधियों को हार माननी ही पड़ी।
5 वर्ष की आयु में डाॅक्टरों ने इनके पैर में स्टील ब्रास फिट कर दिया। जिसे इन्हों 6 वर्षों तक पहना। ‘विल्मा’ में कुछ कर गुजरने की दृढ इच्छाशक्ति थी। वह एक धाविका बनाना चाहती थी। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति उन्हें समय-समय पर प्रेरित करती थी। आखिर कब तक यूं ही विकलांग बन कर जीवन जीएगी। उसे तो ‘धाविका’ बनना है। इनकी इसी ‘दृढ़ इच्छाशक्ति’ ने इन्हें बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाया। इन्होंने मानसिक रूप से स्वयं को बीमारी से जूझने का सामथ्र्य विकसित किया। इन्होंने परिस्थितियों से समझौता करने के स्थान पर परिस्थितियों से जूझना बेहतर समझा। हालंाकि एक विकलांग के लिए विपरीत परिस्थितियों से लड़ना लगभग असंभव-सा ही था, विल्मा समझौता करने के मूड में नहीं थी।
उन्होंने स्टील ब्रास के सहारे ही चलना प्रारंभ किया। वह प्रतिदिन अपने घर से मेहरी मेडिकल काॅलेज जो नेशविले में था, तक पैदल जाती थीं। जहाँ पर उसकी थेरेपिक मालिश (Therapeutic Massage) की जाती थी। इसके अतिरिक्त उसकी माँ भी उसके पैरों की मालिश किया करती थीं। उपचार के साथ-साथ विल्मा की सकारात्मक सोच और उसकी धाविका बनने की ‘दृढ़इच्छा’ ने असर दिखना प्रारंभ किया। विल्मा की बीमारी धीरे-धीरे ठीक होने लगी। 11 वर्ष की अवस्था में उन्होंने स्टील ब्रास पहनना छोड़ दिया। स्टील ब्रास के बिना चलना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्हें स्वयं को विश्वास दिलाना था कि वह चल सकती है। ब्रास ;ठतंबमद्ध का अब उनके लिए कोई महत्त्व नहीं है। इन्होंने ऐसा ही किया। जिसके परिणामस्वरूप विल्मा ने बिना किसी ब्रास के चलना सीख लिया। ये विल्मा के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पड़ाव था। विल्मा ने बिमारी पर तो विजय प्राप्त कर ली लेकिन इनका धाविका बनने का सपना बाकी था। हिम्मत हारना उन्होंने सीखा नहीं था। 13 वर्ष की आयु में इन्होंने अपनी प्रथम दौड़ में भाग लिया। पर वह इसमें अंतिम स्थान आईं। बावजूद इसके इन्होंने धाविका बनने की अपनी जिद्द को नहीं छोड़ा। उनके सामने तो बस एक ही सपना था दुनिया की श्रेष्ठ धाविका बनने का। फिर छोटी-मोटी हार क्यूंकर इनके दृढनिश्चय को डिगा सकती थी। उनकी मंजिल बहुत दूर थी पर इन्हें उसे पाने का पूर्ण ‘विश्वास’ था और जब ‘विश्वास’ हो तो हर मामुकिन आसान हो जाती है।
विल्मा ने सबसे बड़े टैªक मीट एल्बामा (Alabama) के टूस्केगी इंस्टीट्यूट (Tushegee Institute) में प्रवेश लिया लेकिन यहाँ भी विपरीत परिस्थितियों ने अपना प्रचंड रूप दिखलाया। विल्मा अपनी प्रत्येक रेस में पराजित हुई। बावजूद इसके विल्मा ने अपनी जिद्द को नहीं छोड़ा। इनका सपना तो विश्व की श्रेष्ठतम धाविका बनने का था। वह अपने लक्ष्य को पाने के प्रति अटल थीं। जैसा कि अक्सर होता ही है, लोगों ने इन्हें हतोत्साहित भी किया होगा। उन्हें अपनी जिद्द छोड़ने की भी सलाह भी दी होगी। मगर विल्मा जैसी दृढ़निश्चय वाली बालिका आखिर कहाँ मानने वाली थी। उसे तो अपने सपने को हकीकत में बदलना था। यही उसकी दृढ़इच्छा थी।
इस बीच उसकी मुलाकात एडवर्ड टेम्बल (Edward Temple) से हुई जो उस समय टेनेसी विश्वविद्यालय में टेªक कोच हुआ करते थे। उन्होंने विल्मा को विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित किए जाने वाले कैम्प में बुलाया। विल्मा ने कैम्प में एक दिन में 20 मील की दौड़ पूरी की। इससे आप विल्मा की दृढ़ इच्छाशक्ति की कल्पना कर सकते है की जो कभी पोलियों से ग्रसित थी वह एक दिन बीस मील तक दौड़ लगा रही है। यह अपने आप में किसी भी करिश्मे से कम नहीं है। करिश्मा वे ही करते हैं जो कुछ कर गुजरने की ठान लेते है।
ग्रीष्म-कालीन कैम्प के पूर्ण हो जाने के पश्चात टेम्पल ने अपनी टीम को नेशन ऐमचर (Amateur) एथलेटिक यूनियन काॅन्टेस्ट, जिसका आयोजन फिलाडेल्फिया ;च्ीपसंकवसचीपंद्ध में किया गया, हिस्सा लेने भेजा। इन खेलों में विल्मा ने नौ रेसों मंे भाग लिया और सभी में विजय प्राप्त की। यही से आरंभ हुई एक पोलियोगस्त धाविका की विजय यात्रा, जिसे इन्होनंे एक कठिन संघर्ष के पश्चात् प्राप्त किया था।
विल्मा ने सन् 1956 में मेलबोर्न, आस्टेªेलिया में आयोजित होने वाले ओलम्पिक खेलों में भाग लिया, जहाँ 200 मीटर की रेस में वह पराजित हुईं परंतु 4 × 400 मीटर की रिले में इन्होंने कास्यंपदक जीता जो इनकी मंजिल का पहला पड़ाव था। लेकिन विल्मा की मंजिल तो अभी और दूर थी।
सन् 1960 में रोम में आयोजित होने वाले खेलांे की 100 मीटर 200 मीटर तथा 4 × 100 मीटर दौड़ के लिए क्वालिफाई किया। इन्होंने इन तीनों ही स्पर्धाआंे में प्रथम स्थान पर रह कर स्वर्ण पदक जीता। अपने इस करिश्मे से इन्होंने किसी ओलम्पिक में 3 पदक जीतने वाली प्रथम अमेरिकी धावक होने का गौरव प्राप्त किया जो उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी अब सही मायनों में विल्मा ने अपनी मंजिल को प्राप्त कर लिया था। विल्मा का सपना वास्तविकता का रूप ले चुका था। वह विश्व की सर्वश्रेष्ठ धाविका बन चुकीं थीें।
मात्र 4.5 पौंड वजन तथा पोलियो से ग्रस्त बालिका संसार की सर्वश्रष्ठ धाविका थी। किसी ने ऐसी कल्पना भी न की होगी कि यह असमक्षम बालिका विश्व की एक सर्वश्रेष्ठ धाविका बनेगी। विश्व की श्रेष्ठ धविका बनने पर उन्हें इटलीवासियों ने 'La Gazzela Nera' अर्थात काला चिंकारा कहा तो फ्रेंचवासियों ने 'La Perle Haire' अर्थात काला मोती के नाम से संबोधित किया।
इसे आप क्या कहेंगेदृभाग्य या उसका पुरुषार्थ। शायद भाग्यवादी इसमें भाग्य इसके भाग्य को धन्य मानें। मगर पुरुषार्थी तो उसके पुरुषार्थ से ही प्रेरणा लेंगे कि किस प्रकार विल्मा विषम परिस्थितियों को धता बताकर ‘श्रेष्ठतम’ धाविका बन गई। अब मर्जी आप की है, फैसला आप का। इसे आप किस रूप में लेते हैं। उसके भाग्य को महत्व देते होे या उसके पुरुषार्थ को।  जिन्हें जीवन में अपने लक्ष्य को पाना है, कुछ करके दिखाना है उन्हें तो विल्मा से प्रेरणा लेनी ही होगी। विल्मा एक उदारहण है, गिर-गिर कर संभलने का, न केवल संभवले का बल्कि संभलकर हर परिस्थिति मे अपने लक्ष्य को पाने का। इसमें कोई दो राय नहीं।

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